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Hymn No. 2422 | Date: 17-Aug-2001
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प्रभु तू ही बता कैसे तेरा गुणगान करूँ, कैसे तेरे प्रेम का रसपान करूँ।
प्रभु तू ही बता कैसे तेरा गुणगान करूँ, कैसे तेरे प्रेम का रसपान करूँ।
कोशिशों में कमी ना थी, पर मन कभी लगता था कभी नही, प्रभू तू...
अड़िग था अपने इरादे पे, पर इरादे भी हिलते थे हालातों में, प्रभु तू...
नाश करना चाहता था मैं अपने मैंय का, पर दास बनाये बैठी थी इच्छाये, प्रभु तू...
तसव्वूर पाता हूँ तेरे पास आके, पर तेरे बताये कर्तव्यों से क्यो मुँह चुराऊँ प्रभू तू...
बंदगी करना चाहता हूँ तेरी प्रेम से, पर बंदिश क्यो नहीं चाहता हूँ अपने आप में प्रभु तू...
दिल तड़पता है कई बार, पर कायम क्यों नहीं रहती तड़प मेरी, प्रभु तू ही बता
जाने अनजाने में भागता है मन तेरी ओर, फिर क्यों भागता हूँ दूजी ओर, प्रभु तू...
बिसुरता हूँ कई बार यादों में, फिर क्यों भूल जाता हूँ कहकहों में, प्रभू तू...
मिलना चाहता हूँ हर पल के लिये, फिर मिलके क्यों बिछुडना पड़ता है तुझसे, प्रभु तू...
- डॉ.संतोष सिंह
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बात है ये तो दिल की, नजरों से उतरके दिल में समा जाने की।
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