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Hymn No. 2423 | Date: 17-Aug-2001
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मैं इतरा रहा हूँ, अपने आप पे जो तुझसे प्यार है।
मैं इतरा रहा हूँ, अपने आप पे जो तुझसे प्यार है।
मानो तू छेडता है बारबार, मचलता है मन अहसास होते तेरा।
रह न पाता हूँ अपने आप में, ठुमकते हैं कदम अनायास जो।
लगाते है सारे कयास, कहीं मैं पागल हुआ तो नहीं।
कहने को कोई जो भी कहे, रोक टोक ना करूँ किसीके कहने पे।
मैं तो बस दिवानगी में झूंमना चाहूँ, प्यार तेरे गीतों को मानां चाहूं।
सपनो की दुनिया से तुझे उतारके, हकीकत में तुझे लाना चाहूं।
सलामती की फिकर किसे है, परवाने पन के अंदाज को पाना चाहूं।
जिद् ना है किसी बात की, मस्ती में जिंदगी का हर दौर गुजारना चाहूं।
कहे चाहे कोई भी कुछ, तुझे अपने अंतर में संजोके जीना चाहूं।


- डॉ.संतोष सिंह