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Hymn No. 2424 | Date: 18-Aug-2001
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प्रभु जी तू कैसे सहता है हमको, ध्यान नहीं देते रों में बहके न जाने क्या कुछ कह देते प्रभु।
प्रभु जी तू कैसे सहता है हमको, ध्यान नहीं देते रों में बहके न जाने क्या कुछ कह देते प्रभु।
अज्ञान के है इतने खान भान भीनहीं रखते प्रभु जी तेरे सम्मान का प्रभु...
इच्छाओं पे तेरे ना चलके, चलवाना चाहते है तुझको अपनी इच्छाओं के अनुरूप ।
समर्पण भक्ति में लगाते नहीं मन को, चले जाते है अंतरद्वंदो में प्रभु जी...
दिल में प्यार बसाने की जगह, करतेहै तूलना तेरी बात ओर हरकतों की प्रभु जी...
अंजाम नही दे पाते तेरे बताये कर्तव्यों का, तो चूक गिनाते हैं तेरे कहे हुये में प्रभु...
कोरे अलफाजों से बांधना चाहा तुझको, रोक ना सके अपने आपको चूक दर चूक करते गये
कथनी करनी में भेंद था खूद के, उसे ना मानके दुखाते गये तेरे मन को प्रभु
कृपा से तेरी जब भान होता है अपनी गल्तियों का, तो रोते है पहलु में तेरे सर रखके
हाथ फेरते तेरे फिर से दोहराते है वही गल्तियों को...
बनती बातों को बिगाड़ते रहे, फिर भी बस ना किया जीवन नैया को ना संवारने का दोष लगाते रहे।
- डॉ.संतोष सिंह
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