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Hymn No. 2425 | Date: 23-Aug-2001
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देखा मजिल की ओर, जा रही थी कई राहे।
देखा मजिल की ओर, जा रही थी कई राहे।
कोई विचारों से चलता जा रहा था लगातार।
तो कोई भावों की नैय्या से तैरते बढ रहा था।
कोई बारम्बार जपते हुये अपनी धूनं में गा रहा था।
तो कोई आनंदमग्न होके अपनी तपस्या में जी रहा था।
कोई था मग्न ध्यान में, चुपचाप करता जा रहा था प्रयास।
तो कोई जग में रहके, गीतों को सुरों में पीरो रहा था।
कोई साध रहा था अपने आपको, योग के अनरूप बढने के वास्ते।
राहें भले अलग अलग थी, पर दृडनिश्चयी थे सबके सब।
होने ना दे रहे थे किंचीत भी विलंब, अडिग थे अपने पुरूषार्थ में।


- डॉ.संतोष सिंह