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Hymn No. 2430 | Date: 28-Aug-2001
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शरीर के हर अंग में जलन होती है वही सच्ची तड़प है।
शरीर के हर अंग में जलन होती है वही सच्ची तड़प है।

जब शरीर के सारे अंग अंग में शीतलता का अहसास है तो वो प्यार की।

हम प्रभु के आशिष को भी अपनी सीमा में बांध कर रखने की कोशिश करते है जब कि वह असीम होती है।

कर्म ओर कर्मों का विपाक जब जन्म लेता है तो प्रभु भी विनाश को नहीं रोक सकता है, कई कालों से पकने के बाद उसके परिणीती का वख्त आ जाता है।

कई बार अपने कर्मों के परिपाक को हम प्रभु का वर्तन समझ बैठते है।

जबकि दोनों में बहुत ज्यादा भेद रहता है।


- डॉ.संतोष सिंह