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Hymn No. 2432 | Date: 03-Sep-2001
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मेरे गीतों को कोरे शब्द ना समझना, उपजे है तेरे प्रीत के अंकुर से।
मेरे गीतों को कोरे शब्द ना समझना, उपजे है तेरे प्रीत के अंकुर से।
बरसाया है तूने निगाहों से प्यार की बरसात, डाला हमने श्रध्दा की खाद।
बड़े विश्वास से किया है जतन, रूक रूककर सींचा है भावभीनी आसुओं से।
व्यवहार की धूप दिखाया वख्त वख्त पे, बड़े हसरतों से है इसे बढाया।
मानता हूँ मालिकी है तेरी पर, तुझ सौंपने से पहले खिलाना चाहता हूँ इसे।
माना मेरे बस में ना है कुछ, फिर भी अपने कर्तव्य पथ पर से डिगाना नहीं चाहता।
रहते वख्त पूरा कर दिखाना चाहता हूँ कहा तेरा, छोड़के सारी असमर्थता।
धरा के हर कोने पे प्रभु बसाना चाहता हूँ तेरे प्यार की बगिया।
पुरूषार्थ का होम करते, पूरा करना चाहता हूँ अशक्य भरे कार्यों को।
देर की अब कोई वजह ना है, हर वजह मिट जाये प्रभु तेरी परम कुपा से।


- डॉ.संतोष सिंह