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Hymn No. 2434 | Date: 05-Sep-2001
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तेरी निगाहें ढाती है कयामत हमपे, कभी प्यार बरसाये कभी आग हमपे।
तेरी निगाहें ढाती है कयामत हमपे, कभी प्यार बरसाये कभी आग हमपे।
देती है सिला किये का हमारे, न जाने कैसे भांप जाता है अंतर को हमारे।
विशाद में पड़े मन पे डालती है फूहार शीतलता से भरी नजरों से।
कुरेद के रख देती है दिल में दबे सारे जज़बातों को कहने के लिये।
रहते नहीं हम आपे में, बह उठते है दिल से होते हुये आँखो से।
छिपंना चाहता नहीं हूँ, न ही छिपा रहता है कुछ तेरी नजरों से।
बीत जाता है न जाने कितना समय कुछ एक पलों में, जो रहता है तू नजर डाले।
अशांत मन को चैन मिलता है, जैसे जैसे निगाहों से बरसती प्रेम फुहार उसपे पडती है।
रह नहीं पाता हूँ अपने आपे में, कही अंतर में से मस्ती का ज्वार जो उमड़ता है।
न जाने कब तक तू खेल खेलता रहेगा, यूं ही मिल मिलके बिछुड़ने का।
- डॉ.संतोष सिंह
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मत रोक दिल में उठती हुई तरंगो को, उदात्त होके बहने दे।
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टूट जाये चाहे श्वासों की डोर, तू न मुझसे कभी रूठना।
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