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Hymn No. 2441 | Date: 18-Sep-2001
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प्यार के सिवाय कोई बात कहने को अब रूचती नहीं।
प्यार के सिवाय कोई बात कहने को अब रूचती नहीं।
दिल जब तक मिल न ले तब तक मानता नही।
मन भी लगा है अब ढूंढ़ने बहाने मिलने के।
तरसते हुये नयनों को मिलता है नैन, जब तक मिले न मेरे।
भटकता रहूँ कहीं भी, अनायास घिरा रहता याँदों से तेरी।
बनने बिगड़ने की परवाह नहीं, परवाह रहती है मिलके तुझसे कहने की।
गुमसुम से पलों में, महसूस करता हूँ करीब तुझको अपने।
जो न पाता हूँ तुझको हकीकत में, तो देखता हूँ ख्वाबों में।
सहेज रहा हूँ पल पल को, बीते सदियाँ अनंत जो तेरे संग।
पूरा करना चाह रहा हूँ, उन कल्पनाओं को जिनको देखा हूँ अंतर में।


- डॉ.संतोष सिंह