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Hymn No. 2443 | Date: 19-Sep-2001
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मैं कैसे बताऊँ, मैं कैसे बताऊँ, अपने प्यार को।
मैं कैसे बताऊँ, मैं कैसे बताऊँ, अपने प्यार को।
इक बार मापा जा सकता है संसारको, पर माप सकता नहीं कोई मेरे प्यार को।
मैं कैसे बताऊँ, मैं कैसे बताऊँ, अपने दिल की गहराई को।
इक बार सागर की गहराई नापी जा सकती है, पर नाप सकता नहीं कोई मेरे दिल की गहराई को।
मैं कैसे बताऊँ, मैं कैसे बताऊँ अपने मन में छिपी हुई बातों को।
इक बार लिखी जा सकती है कोई महाकथा, पर मेरे मन के प्रेम कथा के लिये अधूरे पड़ जायेगे शब्द संसार के।
मैं कैसे बताऊँ, मैं कैसे बताऊँ, अपने ख्वाबों को।
दुनिया भरके अनोखे दृश्य अधूरे पड़ जायेंगे, पर उनसे न भरे जा सकते है रंग मेरे ख्वाबों में।
मैं कैसे बताऊँ, मैं कैसे बताऊँ अपनी तड़प को।
सारा दर्द उड़न छू हो जाये, जो देख ले तड़पते विरह में इक् बार को मुझको।


- डॉ.संतोष सिंह