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Hymn No. 2444 | Date: 19-Sep-2001
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दावेदार न हूं तेरे प्यार का, नाचीज है कद्रदान छोटा सा तेरा।
दावेदार न हूं तेरे प्यार का, नाचीज है कद्रदान छोटा सा तेरा।
पवित्रता से तेरा न कोई सरोकार है, हम तो गुनाहों के लंबरदार है।
नाम का तेरे माना हम हकदार नहीं, पर दीदार का तेरे तलबगार हूँ मैं।
अनुपम बेमिसाल है अपने आप में तू तो तेरे बनाये पल भरकी तसवीर हूँ मैं।
मस्ती का खुशनुमा झोंका है तू, तो तेरी दुनिया के दर्द का सैलाब हूँ मैं।
करुणा भरी तेरी नजर अमृत की खान है तो चेहरे पे उभरी अश्कों की बूंद है हम।
माना रोशन है सारा जहाँ तुझसे, तो हम जलती हुयी आग है।
तेरे सामने गुजरता है सारा संसार पल पल में, तो हम वख्त के सांचे में ढलके तेरी पहंचान है
मानां उपजाता रहा है तू सब कुछ, जनमों जनम के बाद विराम है तू मेरा।


- डॉ.संतोष सिंह