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Hymn No. 2445 | Date: 19-Sep-2001
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हे.. कैसे समझाऊँ, कैसे समझाऊँ, अपने दिल को, जो दावा तो नहीं पर प्यार है तुझसे।
हे.. कैसे समझाऊँ, कैसे समझाऊँ, अपने दिल को, जो दावा तो नहीं पर प्यार है तुझसे।
है... कैसे कहूँ बदनसीबी का चोली दामन का साथ है मेरा, जब मिला हो खुशनुमाँ तेरा साथ।
है.. कैसे कहूं, कैसे कहूं कि दूर है मुझसे, तेरे सिवाय जो कोई करीब न हो मेरे।
है... कैसे बहलाऊँ मन को जो देंखे तेरे दिवास्वप्न, जो रोकूं तो भिगा जाये नयनों के कोर।
है... कैसे मिटाऊँ तलब अपने अंतर की, जो जागते सोते बनता रहता है इक नया गीत प्यार का।
है कैसे कहूं अफसानों से भरी बातों को, जो सुध में ही न रहने दे मुझको।
है... कैसे कहूं कि तू न करे कुछ मेरे लिये, जब हो तू एकमात्र कर्ता धर्ता मेरा।
हाँ इक बात कह सकता हूँ अब कोई छीन न सकता तुझको मुझसे जो हो गया तू मेरा।


- डॉ.संतोष सिंह