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Hymn No. 2446 | Date: 20-Sep-2001
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जो कह न सके हम जुबां से, वो कह दिया निगाहों से।
जो कह न सके हम जुबां से, वो कह दिया निगाहों से।
इनायत थी उनकी, जो सुन लिया नजरें झूका के हमको।
आलम है ये प्यार का, न जाने कब छलक पड़े यार की यादो में।
यार के साथ रहते न जाने कैसे बीत जाता है समय पलों में।
खुशनुमाँ लगता है सब कुछ, जो छायी रहती है प्यार भरी मस्ती।
अहसास नहीं होता किसी बात का, जो सरोकार न रहता किसी से।
बीतते है पल यार की धुनों में, बुनते है हर पल जो नये नये ख्वाबो में।
रहता नहीं तब कोई और राग, जलते है जो प्यार की आग में ।
दाबे नहीं दबती छलकती है रोम रोम से, करती है चूर जो औरो को।
नाचता है दिल मयूर बनके, यार की बाँहो में जैसे घटा हो सावन की।


- डॉ.संतोष सिंह