VIEW HYMN

Hymn No. 2447 | Date: 22-Sep-2001
Text Size
प्रभु प्रेम की अविरल धारा बहने दो, शब्दों को बूंदो में ढलने दो।
प्रभु प्रेम की अविरल धारा बहने दो, शब्दों को बूंदो में ढलने दो।
श्रध्दा के अविरल जोर से, गीतों को लड़ियों में पिरोने दो।
सींचते रहो ह्दय को अखंड तेरे भावों से, दूर हो जाये सारे कुभाव।
सूत्रपात हो जाये जीवन में पुरूषार्थ का, कर्मठता ले जाये पास तेरे।
श्वासों का दास न बनके, बन जाऊँ मीत तेरे मन का।
जो कर न सका अब तक, कर जाऊँ गाते गाते गीत तेरा।
चार चांद लगाऊँ तेरे नाम पे, भक्ति के नये आयाम गढ़ते हुये।
वख्त रहे चाहे जीवन मैं कैंसा भी, मसरूफ रहूँ तेरे नाम धुन में।
गुनगुनाहट बदल जाये तेरे प्रेम भरे महाकाव्य में।
वख्त हो चाहे जीवन में कैसा भी, मसरूफ रहूँ तेरे नाम धुन में।


- डॉ.संतोष सिंह