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Hymn No. 2455 | Date: 27-Sep-2001
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कागज को काला न करने बैठा हूँ, दिल की बात तुझसे कहने आया हूँ।
कागज को काला न करने बैठा हूँ, दिल की बात तुझसे कहने आया हूँ।
जो उमड घुमड़ रहा है मन में, उसको तेरे चरणों में अश्कों की बूंद बनाके गिराने आया हूँ।
कैसे बताऊँ दिल की व्यथा को, जो मसरूफ रहे तू अपने में।
मैं तो छोड़ना चाहता हूँ तुझको, अपनी प्यार भरी बातों से।
दुःखों की है बड़ी लंबी फेहरिस्त, जो तुझसे शुरू होके खत्म होती है तुझमें।
अदना तोहमत नही लगाता है तूझपे, पर अपनी बात कहे बिना रह नहीं पाऊँ।
कब तक करता रहेगा सुनके अनसुना, क्या तेरा उसूल यही है।
सुना था प्यार में टूट जाते है सारे उसूल, तो क्यों रखा है हमको दूर।
मजबूर बना फिर रहा हूँ तेरे प्यार में, तुझको अपना बनाने के वास्ते।
वख्त पे वख्त गुजरता जा रहा है, पर हमराज हो जाने का राज जान ना पा रहा हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह