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Hymn No. 2465 | Date: 04-Oct-2001
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कैसे कहूं कि तू दूर है, तो मेरे मन में रहता है ये कौन।
कैसे कहूं कि तू दूर है, तो मेरे मन में रहता है ये कौन।
कहना मुश्किल होता है, जब तुझे पाता हूँ यादों में अपनी।
जब रहता हो तू दूर, तो कैसे देता है जवाब मेरी बातों का दिल में।
जब तब बंद करता हूँ पलकों को, तो न जाने कैसे उभरती है छवी तेरी।
रातों को भी रहता है हर पल, तू ख्वाबों में नींदे चुराते मेरी।
कह सकता है कोई ओर वर्क तू ना है, पर मुझे लगता है नामुमकीन।
कभी कभी होता है अहसास कि रहता है हर पल तू मेरे साथ साथ।
अंदाज तेरा हर बार होता है अनोखा, अहसास दिलाने का।
सब कुछ रचा हुआ है तेरा, तो मैं क्यों रीता हूँ प्यार से तेरे।
कमी है जो मुझमें, तो क्यों नहीं पूरी करवा लेता है उस कमी को।


- डॉ.संतोष सिंह