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Hymn No. 2466 | Date: 05-Oct-2001
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निकला हूँ ऐसी राह पे, जहाँ कोई नहीं तेरे सिवाय अपना।
निकला हूँ ऐसी राह पे, जहाँ कोई नहीं तेरे सिवाय अपना।
चलते चला जा रहा हूँ, तेरे ख्यालों ख्यालों में विचरते हुये।
चैन नही है मेरे दिलको, कदम पर कदम भर रहा हूँ यादों में तेरे।
एक के बाद दूजा दौर आ रहा है, पर मेरी चाहत बन गया है तू।
तेरा कहा करने में कोई रंज नहीं, पर करने से पहले हो जान चांहू तेरा।
सवालिया निशां खडा कर सकता है कोई मेरे उपर, पर मेरे प्यार पे नहीं।
मजा हुआ कोई खिलाड़ी ना हूँ, पर जैसे जैसे तेरा नाम रस पीता रहा आगे बढ़ता गया।
खौफ मिटता जा रहा है मन का, धीरे धीरे दिल जो चूर होता जा रहा है प्यार में।
कोई कसर ना छेडूंगा, नामुमकीन को मूमकिन बनाऊंगा प्यार से अपने।
जिसका हाथ पकड़ हूँ उसकी कृपा से, अपने ख्वाबों में रंग भरके दिखाऊंगा।


- डॉ.संतोष सिंह