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Hymn No. 2467 | Date: 05-Oct-2001
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छेड़ती है मुझे तेरी यादें अकेले में, मेरी हालत पे गुंजन करती है मन की बातें।
छेड़ती है मुझे तेरी यादें अकेले में, मेरी हालत पे गुंजन करती है मन की बातें।
फिर भी समझाता हूँ सबको बतलाते हूये, जो आज है दूर कल होगा वो मजबूर।
दिल की बात है ये, कब, कैसे, कह नहीं सकता मैं अभी, पर होगा होगा जरूर।
शिकवा है अगर उसको, तो दूर करेगे उसके हर शिकवे को, अपना बनाने के वास्ते।
उसको खुश करने के लिये, उसकी राह में फूल बनके गिरूंगा कदमों को चूमने के वास्ते।
दिल से करुँगा मिन्नत, ऐ हमको बनाने वाले, हमारे प्यार को रखना जवां तेरे वास्ते।
लुटके सजाऊंगा तेरे दामन को, अपने ख्वाबो को दुनिया में बसाऊंगा सबसे उपर।
ऐ मालिक तेरा हुक्म बजाने के शिवाय करुँगा कुछ ओर ना, पर मसरूफ रखना तू प्यार में तेरे।
दिल की बात तू दिल से जान लेना, किसी बात का कभी कोई पर्दा ना रखूंगा।
बीच राह में ना छोड़ना तू कभी मुझे, चाहे किसी भी कारण से मजबूर हो जाऊँ मैं कभी।


- डॉ.संतोष सिंह