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Hymn No. 2468 | Date: 06-Oct-2001
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अभी और कितनी बार तुझे मौका दूंगा रूसवा होने का।
अभी और कितनी बार तुझे मौका दूंगा रूसवा होने का।
तेरे पास रह रहके कब तक रोऊँगा रोनां ना करने का।
अजीज आ गया हूँ अपने तौर तरीकों से, कैसे ईलजाम दूं औरों को।
चाहा था क्या, ओर करते क्या चला गया रहके पास तेरे।
वो कौन से थे कर्म, जिसने गढी किस्मत मेरी ऐसी।
ऐसी की तैसी की हमने, कि पहुँचाया चोट ना कभी तूने।
ऐं गढने वाले फिर भी मान ना हम, पहुँचाते रहे चोट तुझको।
जो तेरा आशीष रहते हुये ना करके दिखा सके कुछ तुझे।
मौका पाया तेरी कृपा से, ओर गवाया अपनी आदतों से।
उसे शहादत देना चाहता हूँ, तेरा कहां करने में जान लगाना चाहता हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह