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Hymn No. 2469 | Date: 06-Oct-2001
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अच्छा हुआ तेरे पास रहके, दूर रहा तुझसे अपने कर्मों के चलते।
अच्छा हुआ तेरे पास रहके, दूर रहा तुझसे अपने कर्मों के चलते।
नाकामियों की बेड़ी थी इतनी मजबूत, तोड़ ना सका उसे पुरूषार्थ से अपने
प्यार को भी धीरे धीरे खोता चला गया, अपने मनमानियों के चलते।
कमी ना थी कभी तूने, पर हमने ना सीखनें की कुछ ठांनी।
बडा बना फिरता था, सारी हेकड़ी निकलने लगी जो पड़ा पाला दुनिया से।
तेरे नाम की आड़ में, अपनी झूठी मस्ती दिखाता था दुनिया को।
हंसता था अपने आप पे, मिल गया उपनाम दूसरे नाम का।
उपर उठने से पहले, बदनामियों का सिलसिला साथ साथ चलने जो लगा।
दगा दिया तुझको, ओर रखा धोखे में खुद को, फिर भी सम्भालना न आया।
वख्त रहते वख्त का फायदा ना उठाके, किस्मत का रोना रोते रहे हम।


- डॉ.संतोष सिंह