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Hymn No. 243 | Date: 30-Jul-1998
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ऐ पिता तू ये बात कब होगी मेरी आस पूरी, कब झूमूँगा आके मस्ती में तेरी ।
ऐ पिता तू ये बात कब होगी मेरी आस पूरी, कब झूमूँगा आके मस्ती में तेरी ।
कब तेरे प्रेम का अंकुर फुटेगा मेरे दिल सें, कब मैं इस संसार के मायाजाल से हो मुक्त हो के लूंगा तेरा नाम ।
क्या मेरी पूजा – प्रार्थना झूठा – दिखाता है, तेरे प्रति क्याँ मैं लायक नहीं हूँ ।
क्या मेरे मन की बात सच्ची नहीं, कहीं मेरी लगन में कमी कोई है ।
मैं सच कहता हूँ तुझसे, तेरे पास बैठने का दिल करता है मेरा।
मैंने तुझको अपना है सब कुछ माना, हर दीवार को तोड़के तेरा बनना चाहूँ ।
जो भी कमी है मुझमें तू दूर कर दे उसे, सारी जिल्लत उठाके तेरी शरण में आना पड़ा तो आऊँगा।
मुझे तो बस तेरा गीत गाना है यू ही कहीं भी रहके तेरा नाम लेके गुनगुनाऊँ ।
मुश्किल जो भी आये मेरे तन मन पे, वो तुझे सौंप के, तेरा हो जान चाहूँ ।
मुझे कोई भी गम और दर्द है स्वीकार, तुझमें खोने के लिये हर खुशी लुटाना चाहूँ ।
जुटाना ना है कुछ मुझे, जुटाना बस तो दिल और मन में या तन के रोम – रोम को, भर दूँ तेरे नाम से ।
कहीं क्या, कही क्या नहीं, मेरा तू ही तो इक् सही, जब तू हि ना तो सब कुछ होके मेरे लिये कुछ भी नहीं ।


- डॉ.संतोष सिंह