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Hymn No. 2479 | Date: 29-Oct-2001
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मालूम है मालूम, तुझे कोई शौक नहीं, ना ही कोई रोक।
मालूम है मालूम, तुझे कोई शौक नहीं, ना ही कोई रोक।
तू रमता है अपनी मस्ती में, ना ही तुझे कोई टोक।
बनाता है अपने नियमों को, आजमाता है अपने ही उपर।
जहाँ में आके अपने प्रेमियों से मिलके चला जाता है जो चुपचाप।
ना किसी से कोई मतलब, मतलब है ना किसीके मौज से।
खोज पाता नहीं कोई पास रहके, जब तक ना बरसे कृपा तेरी।
वफा का प्यार परवाना चढे, चढे ना तूझपे कोई ओर सुरूर।
कुछ भी ना है जरूरी, तेरा कहा करना है सबसे ज्यादा जरूरी।
जो हो तेरी मजूरी तो तेरी खिदमत ही है इबादत मेरी।
हर गुजरते पलों के संग, तू गहराता जाता है अंतर में मेरे।


- डॉ.संतोष सिंह