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Hymn No. 2480 | Date: 02-Nov-2001
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मारा हूँ मैं अपने आपका, ना किसी और के कारण का।
मारा हूँ मैं अपने आपका, ना किसी और के कारण का।
जो खुदा के पास रहके, कर न पाया खिदमत खुदा की।
दोष ना है मेरी किस्मत का, जहमत जो ना उठायी कुछ करने की।
देने को तो बैठा था तैयार वो, सब कुछ, लेना जो ना आया हमको।
इतने पे भी ना टूटा भरम, पुरूषार्थ का बाना चाहके भी ना पहना।
रहके पास उसके तरसते हैं नजर भरके प्यार को जो हम।
भावों का समदर रहते, इंतजार करते हैं वख्त के आने का।
बरसती कृपा को भुलाके, फरियाद करते हैं चमत्कारों के लिये।
ऐ खुदा समझदारों को समझा दिया है सब कुछ तूने तो अब तक।
इस मुर्ख को कौन समझाये, जो सब कुछ होते हुये बना बैठा है अज्ञानी।


- डॉ.संतोष सिंह