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Hymn No. 2481 | Date: 02-Nov-2001
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एक बार फिर से डूब जान चाहता हूँ तेरे भावों में।
एक बार फिर से डूब जान चाहता हूँ तेरे भावों में।
दिल में उमडते प्यार को, सौंप देना चाहता हूँ तेरे हाथों में।
उमगो की बरसात में भीगते हुये, रहना चाहता हूँ तेरे प्यार की मस्ती में।
मेरी कश्ती को कोई सहारा दे या ना दे, तेरे सहारे चलना चाहता हूँ मझधार में।
सारी बंदिशों को तोड़ते हुये, चूम लेना चाहता हूँ तेरे कदमों को।
अंजाम जो भी हो मेरा, आँच ना आने दूंगा तेरे प्यार पे।
रहम की भीख ना चाहिए मुझको, ना ही दया से बनी किस्मत ।
पर तेरे हाथों से मिले विष का प्याला, खुशी से झूमके पीलूंगा।
जो बात आज बनती नजर ना आ रही है, उसको तेरे प्यार में चूर होके कर लूंगास।


- डॉ.संतोष सिंह