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Hymn No. 2485 | Date: 03-Nov-2001
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जलना चाहता हूँ प्यार में तेरे अखंड दीप बनके।
जलना चाहता हूँ प्यार में तेरे अखंड दीप बनके।
चढ जान चाहता हूँ कदमों में तेरे प्यार के फूल बनके।
महकना चाहता हूँ करीब तेरे रहके प्यार की सुगंध बनके।
छाया रहना चाहता हूँ चारों ओर तेरे धूप का धूआँ बनके।
चढ जाना चाहता हूँ तेरे चरणों में छप्पन भोग बनके।
दर पे तेरे आने वालों के कदमों को चुमूं पाय्यरी बनके।
छू लेना चाहता हूँ तेरे ओठों को मुरलिया बनके।
बन जाना चाहता हूँ तेरे साजों सामान का आभुषण।
समा जाना चाहता हूँ तेरे दिल में प्यार की तरंग बनके।
नृत्य करना चाहता हूँ तेरे संग मस्ती भरी उमग बनके।
जो ना हुआ आज तक वो कर जाना चाहता हूँ तेरा बनके।


- डॉ.संतोष सिंह