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Hymn No. 2487 | Date: 04-Nov-2001
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तसव्वूर ना है दिल में, जब तक हर बात ना कह लूंगा तुझसे।
तसव्वूर ना है दिल में, जब तक हर बात ना कह लूंगा तुझसे।
न जाने कैसे भाव आते है मन में, जब तक सामने तेरे बयां ना कर लूंगा।
कब होगी मेरी ये साध पूरी, रह रहके कचोटती है मेरे अंतर को।
ऐसा कौन सा है करम, जो राह रोके खड़ी है मेरी बरसों से।
तेरे दिये दर्द में है सुकुंन, फिर भी छलकना चाहता हूँ कदमों में तेरे।
फड़कते लफ्जों से निमग्न होके गाना चाहता हूँ प्यार के गीत।
कसमसाहट से भरे वख्त में गुजारे नहीं गुजरता वख्त मेरा।
जो बात कहना चाहता है दिल, न जाने क्यों मिलते नहीं सच्चा शब्द।
मनभाव गुनगुनाहट न जाने क्यों ढल नहीं पाते सरगम में।
खामियों से भरे इंसान के चाहे में, इजहार करना चाहता हूँ पवित्र प्रेम का।


- डॉ.संतोष सिंह