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Hymn No. 2489 | Date: 09-Nov-2001
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मौला तेरी रहमत कितनी है, कैसे करूँ इजहार सिखा दे तू हमको।
मौला तेरी रहमत कितनी है, कैसे करूँ इजहार सिखा दे तू हमको।
कुछ नजर आ जाये, तो बहुत कुछ पता न चल पाये, पर बरसे सदा हमपे।
अभागों का भाग्य बनाये, जो आके आँसू पश्चाताप के तेरी देहलीज पे बहाये।
न जाने कितने घोर कर्मों से निजात दिलाये, रोते हुये पे खुशियाँ बरसा दें।
जो आते है सजदे के वास्ते, उनके दर्दों को समेट लेता है तू अपने में।
दुआँ करते है जो कातर हृद्य से, उनके दर्दों को समेट लेता है तू अपने में।
कह देता है जो सच्चा सच्चा हाल दिल का अपने, उनके ख्वाबों को करता है तू सच।
कोई न जाये खाली हाथ तेरे दर से, कुछ न कुछ देता रहा है तू सबको।
दूर कर देता है हमारी कमजोरियों को, तेरी रहमत पे टीका है संसार सारा।
इक ही बात का दिल में है कोहराम, सब कुछ भुलाके हो जाना चाहता हूँ तेरा।
सुबह हो या शाम हम पल करूँ बंदगी तेरी, पर बंदगी का होश न हो हमको।
- डॉ.संतोष सिंह
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