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Hymn No. 2492 | Date: 17-Nov-2001
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प्यार की आग लगी जो दिल में तो, वहाँ हम ही हम थे जलने वालों में।
प्यार की आग लगी जो दिल में तो, वहाँ हम ही हम थे जलने वालों में।
जलके जो खाक हुआ, तो खिला प्यार का फूल हमारे अंतर में।
सोच में पड़ गया थोड़ी देर के वास्ते, ये सच्चा है कि वो सच्चा।
पर जो भी हो रहा है, मजा आ रहा है, अपने आप में किसी बात का।
रह रहके गुनगुना उठता था, जो होती थी हलचल अपने अंतर में।
कभी प्यार तो कभी मस्ती आ रही थी कल्पनाओं के छोरसे ।
दूर तब भी थे, अब भी हैं, पर अहसास नदारद है दिल से दूर होने का।
गोया प्यार परवान न चढ़ा है तब भी, न अब भी, पर आस है दिल में।
बड़े विश्वास से बयाँ करते है प्यार को अपने, रहते है हर पल जो प्यार में डूबे।
लाख उंगली उठायी लोगों ने, फिर भी गौर न करता हूँ किसी पे।
चेताया जा रहा था रह रहके वो, हमने भी कसम खायी थी उफ न करने की।
डरते डरते कदम जो रखा है, पर अब मसरूफ होके प्यार में चलते जा रहा हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह