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Hymn No. 2497 | Date: 22-Nov-2001
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है... हरि नाम की कथा है न जाने कितनी सदियों पुरानी।
है... हरि नाम की कथा है न जाने कितनी सदियों पुरानी।
चढ़ी जो इक जो जिसके जुबानी, बन गया वो उसका दिवाना ।
रह नहीं जाता कोई अपना, सपने भी आते है बस उसके।
खोया रहता है वो अपने में, रचता है सारे पल सरगम सुरों के।
अपने तो अपने बैरी भी जो सुन लें, खो जाते है हरि के सपनों में।
ख्वाबों को देखते देखते हरि को खींच लाता है हकीकत के संसार में।
झुमते हुये झुमता है वो, खाते पीते सोते हरि का गुण गाता है।
है हरि तो एक, पर न जाने कितने उपनाम ओर स्वरूप है उसके।
जिसने जिस स्वरूप से किया प्यार, वैसां स्वरूप धरता रहा वो सदा।
उसकी इसी अदा पे न जाने कितने होते आये कुर्बान, करते हुये हरि का गुणगान।


- डॉ.संतोष सिंह