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Hymn No. 2499 | Date: 23-Nov-2001
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जिंदगी है न जाने कैसी, जब देखो तब देखती है नये नये ख्वाब।
जिंदगी है न जाने कैसी, जब देखो तब देखती है नये नये ख्वाब।
हकीकत को झूठ, ओर झूठ को हकीकत, समझके गुजर जाती है जिंदगी।
खाक होने पे आता नहीं हाथों में कुछ, जो कुछ होता है लुटा बैठते है जिंदा रहते।
गुजरने को गुजरती है हर पल न जाने कितनी सदियाँ, ललक टूटती नही जिंदगी की।
हकीकत को जानते हुये, आँखे मुंदे गुजारते है हम न जाने कितनी जिंदगीयाँ।
पाया हुआ लुटाते है, लूटके कुछ ओर पाने के लिये जिंदगी जीनां चाहते है।
आँखो से देखा, कानो से सूना को न मानके बदलने वालों के लिये जीना चाहते है जिंदगी।
दिल की कही को, मन की अँधियारी गलियों में सुनके अनसुना कर जाते है जिंदगी में
चोट खा खाके सीख नही सीखते, फिर से चोट खाने को जीते है जिंदगी हम।
कितना भी कर ले वाह वाह जिंदगी के हसी पलों में, अंत में निकलता नहीं आह के सिवाय।
जिंदगी से हर एक का हाल एक है, वाक्या हो चाहें कितने भी अलग अलग।


- डॉ.संतोष सिंह