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Hymn No. 2500 | Date: 24-Nov-2001
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ठगता जा रहा हूँ, न जाने कितनी बार अपनेआपको ठगता जा रहा हूँ।
ठगता जा रहा हूँ, न जाने कितनी बार अपनेआपको ठगता जा रहा हूँ।
जानते भी रोक न पा रहा हूँ, हर बार अपने आपको ठगता जा रहा हूँ।
अंतर की मांग कुछ ओर है, फिर भी दौड़ लगाये जा रहा हूँ, न जाने कितनी बार...
अबकी बार हो जाये बस, बेंबस बन उसी पल दोहराये जा रहा हूँ न जाने...
रोके रुकता नहीं, सब्र का साथ छोड़के खड़ा रहता हूँ बेसब्रों के कतार में, की...
लोगों को तो ठगता है कोई ओर, यहाँ तो मशगूल हूँ खूदको ठगने में, की...
नाकाम हुआँ कितनी बार, पर रहा प्रयासों में रूक जाऊँ शायद इस बार, की ...
कभी न कभी तो अंत होगा, जीत होगी मेरे प्रयत्नों की, अब न ठगने जा रहा हूँ।
जो बनती नही दिख रही है, वो भी बनेगी पुरूषार्थ के जोर से, अब ना...
अनंत कृपा के जोर से, अनंत सामर्थ्य को पाऊंगा, अंतर के हर छोर को, अब ना...


- डॉ.संतोष सिंह