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Hymn No. 2501 | Date: 25-Nov-2001
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है... अंतर के जोम पे निरंतर पुकार रहा हूँ, कब तू आयेगा मेरे अंतर में।
है... अंतर के जोम पे निरंतर पुकार रहा हूँ, कब तू आयेगा मेरे अंतर में।
होने को होगा तू पहले से जरूर, खाकसार तो पाना चाहता है तेरे होने का अहसास।
है...... हूँ, कब तू होगा हर श्वासों में मेरे।
होगा तू वहाँ जरूर प्राण बनके, पर इस अनाथ का कब तू बनेगा प्रांणनाथ।
है... ... हूँ, कब तू दिल को मजबूर बनायेगा।
दिल तो धड़कता है जरूर, वो तो तेरे मस्ती में मस्त हो जाना चाहता है।
अब तक जीता था मन के इशारों पें, अब सजा देना चाहता हूँ मन को तेरे सुरावली से।
है... ... हूँ, कब तू समा जायेगा मेरे रोम रोम में।
जब तब अहसास करके तेरा बहुत जी लिया, अब जीना चाहता हूँ , सराबोर होके प्रेम में तेरे।


- डॉ.संतोष सिंह