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Hymn No. 2513 | Date: 07-Dec-2001
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तू इतना अंतर में क्यों गहरे छुपा है, जो न हो पाती है मुलाकात।
तू इतना अंतर में क्यों गहरे छुपा है, जो न हो पाती है मुलाकात।
कभी सताये मिलने की तड़प तो उसी पल क्यों खिंचा चला जाऊँ संसार में।
ये दोहरापन क्यों है, क्या यही है मेरी फितरत जो बदले न बदलती।
क्यों नहीं समझके समझ पाता हूँ, जब जीतने की पारी आती है तो हाथों से गंवाता हूँ।
मालिक सच पूछो तो मैं खुद न समझ पा रहा हूँ, क्यों खेल खेलता हूँ अपने आप से।
कब तक कृपा बरसायेगा, क्यों नहीं मिल ले देता है दिल को दिल से।
निर्बांध गति से बहना चाहता हूँ, कुछ भी हो जाये तुझसे प्यार करना चाहता हूँ।
क्यों है ये मेरी कमजोरी जो चाहने को बदल न पाये करने में।
राज तो बता चुका है जीतने का, तो इंतजार किस बात का कर रहा हूँ।
हाथ फैंलाये गुहार करने के साथ साथ, क्यों नहीं पुरूषार्थ के मार्ग पे बढ़ रहा हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह