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Hymn No. 2518 | Date: 18-Dec-2001
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हैं बहुत चाहा कहना कुछ ऐसा, जिसे सुनके भूल जाये तू सब कुछ।
हैं बहुत चाहा कहना कुछ ऐसा, जिसे सुनके भूल जाये तू सब कुछ।
मचल मचलके रह गया दिल, जो मनमाफिक शब्दों में बात कह न पाया।
न जाने क्या रोके हुये है, जो बढ़ते हुये कदमों को मजिल पे पहुंचा न पाया।
तेरे रहते हुये क्यों होता है ऐसा, जो प्यार भरे सपनों को टूटने से रोक न पाये।
हसरत न रही अब मन में लाखों, तेरे मिलने के बाद बदल गयी जो एक में।
साये की तरह करता हूँ पीछा तेरा, फिर भी अंधेरा होने पे डरता हूँ।
बेबसी में क्यों फंसा हूँ, तेरे रहते क्यों होता है असर औरों का।
आरजू है फरियाद नही, कसूरवार मैं सही पर प्यार मेरा तो निर्दोष है।
मत डिगने दे तू कदम मेरे, टूट जायेगा एक मासूम दिल।
रही सही कसर कब होगी पूरी, तेरे सिवाय क्यों न लगता है कुछ जरूरी।


- डॉ.संतोष सिंह