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Hymn No. 2520 | Date: 19-Dec-2001
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ढूंढता हूँ दिलकी गहराइयों में उतरके तेरी चाहतों को, जो न जाने छुपी हुयी है कहां
ढूंढता हूँ दिलकी गहराइयों में उतरके तेरी चाहतों को, जो न जाने छुपी हुयी है कहां
दृंढ़ता है यादों में तेरे उन मुलाकातों की, जो बता दे बेकरार क्यों न हुआ हूँ अब तक।
ढूंढता हूँ रातों को उतर उतरके ख्वाबों में, तू क्यों नही आता रोज रोज मिलने को।
ढूंढता हूँ नजरों के मिलते तेरी नजरों में, उन खाली जगहों का उनमें कहां जगह है मेरी
ढूंढता हूँ अपनी कल्पनाओं में, तेरे साथ गुजारे न जाने कितने पल फिर भी क्यों न जुड़ सका तेरे से।
ढूंढता हूँ ढेर सारे उन गीतों में जो सुनाया है तूने, इनके अर्थों को जानके मिटा संकूँ बीचकी दूरी मे।
ढूँढता हूँ अपने छोटे से संसार में, उसमें बसके फिर भी तू छिपा रहता है कहां।
ढूँढता हूँ तेरी बतायी अचूक राहों पे चल चलके क्यों न मिलता है तेरा ठिकाना।
ढूँढता हूँ हर मस्जिद मस्जिद के अंतर में, रहते हुये क्यों नहीं रहता है तू वहाँ।
ढूँढता हूँ उतर उतरके अपने अंतर में, जहाँ बस बसके बसा है तू मेरे न रहने पे।


- डॉ.संतोष सिंह