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Hymn No. 2528 | Date: 27-Dec-2001
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लगन बन चुकी है अगन, जो बुझाये न बुझे बढ़ती जाये।
लगन बन चुकी है अगन, जो बुझाये न बुझे बढ़ती जाये।
आज मैं ओर तू, तो कल सारे संसार को समा ले जाना चाहे अपने में।
जब से समायी हैं दिल में, जले ओर जलाये हर पल तड़पाये हमको।
बहुत चाहा सुकूँ पा जाऊँ कुछ देर के वास्ते, इसके बिना ओर छटपटाया।
तो सोचा चलके मिला लूँ नजर तुझसे, पड़ जायेगी प्रेम फुहार दिल पे मेरे।
पूछो मत यारों हाल क्या हुआ मिलके, मिलते ही लगी आग जो जोरों की दिल में।
धधकते - धधकते दावानल बन चुकी है, लपेटे में ले लेना चाहे रोम रोम को मेरे।
भले ही कुछ हो जाये मुझे, पर जलने में आता है मजा इसके बिन चैन पाता नही दिल मेरा
भावों की लकड़ी सुलगती रहती है मन में, ओर आंसू करते है घी का काम।
तेरा प्रेम तो है चिंगारी, होम होती जा रही है हर पल जिंदगी मेरी।
- डॉ.संतोष सिंह
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