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Hymn No. 2530 | Date: 04-Jan-2001
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न जाने अभी कितनी बाते है दिल में, जो अभी तुझे बताना बाकी है।
न जाने अभी कितनी बाते है दिल में, जो अभी तुझे बताना बाकी है।
न जाने अभी कितने सवाल है मन में, जो अभी तुझसे कहना बाकी है।
न जाने कितने ख्वाब देखा है लेके तुझे, उनमें यथार्थ का रंग भरना बाकी है।
न जाने कितनी कल्पना है अंतर में, उनमें यथार्थ के धरातल पे उकेरना बाकी है।
न जाने कितनी बार गुनगुनाता हूँ, उनको नगमों में बदलना बाकी है।
न जाने कितनी बार डूबता है यादों में, उसे साकार करना बाकी है।
न जाने कितनी बार तड़पा हूँ तेरे प्रेम में, पर अंतर को डूबोना बाकी है।
न जाने कितनी बार खांयी है कसमें, उन कसमों को निभाना बाकी है।
न जाने कितनी बार किया करमों के, पर पुरूषार्थ की राह पे चलना बाकी है।
न जाने कितनी बार के चक्करों से निकलकर, अमर प्रेम पथ पर गुम हो जाना बाकी है।
- डॉ.संतोष सिंह
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कल क्यों, कल क्यों, कल पे टाल रखा है क्यों तूने सब कुछ।
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