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Hymn No. 2531 | Date: 08-Jan-2001
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आये थे मन में न जाने कितनी कल्पनाये लिये हुये।
आये थे मन में न जाने कितनी कल्पनाये लिये हुये।
एक एक करके चूर होते गये यथार्थ के धरातल पे।
रही होगी इच्छा तो उसे कभी पूरा करना न चाहा लोभी बनके।
बहुत बार भुगता होगा पर कभी न मांगा, ना कभी जानना चाहा।
रहा दोहराता हर बार यही, हो सके तू इतना करते जाना।
समय सीमाओं में न बंधा कभी, बंधना चाहा तो तेरे साथ में।
मन पे विराम लगायी तेरी कृपा ने, तो क्यों छोड़ दिया दिल को अकेले।
तेरे संग रहते होने का अहसास होते हुये, क्यों न मिले दिल को तसल्ली।
इनकार नही है अपनी कमियों से, हो सके तो और जोर से खुरचते जाना।


- डॉ.संतोष सिंह