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Hymn No. 2532 | Date: 09-Jan-2001
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पुकार रहा हूँ हृद्य से, कब तक तू सुनके अनसुना करता रहेगा।
पुकार रहा हूँ हृद्य से, कब तक तू सुनके अनसुना करता रहेगा।
बंध जाना चाहता हूँ समय रहते तेरे दामन से, कोई कह न सके हूँ दूंजा।
ललक लिये हुये दिल में, बिछाये हुये पलकें करता हूँ इंतजार आने का तेरे।
कौन सा कसूर मेरा जो रोके हुये है राह, जिसे तू भी दूर न कर पाया।
तैयार खड़ा हूँ तेरे संग चलने को, तो क्यों न तराशा प्यार से अपने।
जलाये जा रही है तेरी बेरुखी, इम्तहानों से भरी घड़ी गुजरने का नाम न ले रही है।
देर सबेर मुलाकात होगी तुझसे जरूर, सरूर इतना है हमारे प्यार में।
चूर करके छोडूंगा प्यार में अपने, जो कल का इंतजार न रहा हमको।


- डॉ.संतोष सिंह