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Hymn No. 2536 | Date: 12-Jan-2001
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उमंगो की हवा बह रही है मेरे चारों और, मस्ती में डूबा हैं मेरा रोम रोम।
उमंगो की हवा बह रही है मेरे चारों और, मस्ती में डूबा हैं मेरा रोम रोम।
अंतर में उमड़ रहा है प्रेम का ज्वार, कोई पुकार पुकार के कह रहा है तू मेरे पास आ।
रोके रुकते नहीं कदम, अनायास बढ़ता रहता हूँ हर पल उसकी ओर।
ख्वाबों खयालों की दुनिया से उठाके, ले जा रहे है मुझे धीरे धीरे यथार्थ की ओर।
जो सोचा न था ओर जो जाना न था, साकार हो रहे है हर दिन इक नये रुप में।
ये कैसा जादू है, जो मुझको मुझसे छुड़ाके बुला रहा है पास अपने।
बह रही है अविरल प्रेम की धारा, कहीं दूर से आके धीरे से छूते मेरे हृद्य को।
सृष्टि वही है फिर भी सब कुछ बदला बदला सा लगता है, जैसे किसी ने जादुई छड़ी है फिरायी।
हर चेहरें पे मुस्कान उभरती है नजरों के मिलते ही, जैसे कहीं बहुत पुरानी पहचान है।
अहसास हुआ परम् प्रिय के पास आके, ये तो उसके प्यार का है कमाल।


- डॉ.संतोष सिंह