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Hymn No. 2537 | Date: 12-Jan-2001
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दिल से दिल तू न मिलाना, कही मजबूर हो जाये तू दिल देने को।
दिल से दिल तू न मिलाना, कही मजबूर हो जाये तू दिल देने को।
नजरों को नजरो से तू न मिलाना, कहीं मजबूर हो जाये तू प्यार करने को।
यादों में तू याद न आना, कही मजबूर हो न जाये तू खुद को भूल जाने को।
ख्यालों में तू ख्याल बनके न आना, कहीं मजबूर न हो जाये साक्षात हो जाने को।
मुलाकातों पे मुलाकात तू न करना, कही भूल न जाये खुद के होने को।
संग-संग, रहते रहते रहते कहीं इतना पास न आना, कहीं मजबूर न होना जो पड़े मौंन हो जाने को।
झुमते झुमते कही तू इतना न झुम जाना, कहीं मजबूर करके बहका न ले जाऊँ तुझे।
दौर पे दौर जाम का तू इतना न चलाना, कही मजबूर न हो जाये तू एक प्याला होने को।
अपना बनाते बनाते इतना न अपना लेना, कही मजबूर न हो जाये खुदको पहचानने में।
- डॉ.संतोष सिंह
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उमंगो की हवा बह रही है मेरे चारों और, मस्ती में डूबा हैं मेरा रोम रोम।
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