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Hymn No. 2544 | Date: 06-Feb-2001
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मौंला... मैं बीमार हो गया, जो तुझसे प्यार हो गया।
मौंला... मैं बीमार हो गया, जो तुझसे प्यार हो गया।
बहुत चाहा मिल जाये मर्ज की कोई दवा, मिला तो खूब।
पर मर्ज बढ़ता चला गया, याद आते जो दर्द तू देता चला।
सकूं पाता हूँ अब इसी मैं, जो न हो तो बहुत छटपटाता हूँ।
नजर भरके लिये, गुजारी है न जाने कितनी जिंदगी।
जब वख्त आया तो तू किस कारण से बीमार हो गया।
सौंपता हूँ अपने श्वासों से गूंथी माला, तेरीं जिंदगी के वास्ते।
बेकारी में जो खा रहे थे जंग, कुछ काम का तो हो जाऊँगा।
फेंरहिस्त है बड़ी लंबी, पर उसमें शुरू से आखिर तक तू ही तू है।
तेरे इनाम का हकदार न बन सका तो, तेरे मर्ज की दवा बनना चाहता हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह