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Hymn No. 2547 | Date: 08-Mar-2001
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मांग है, मांग है परमपिता, न जाने तुझसे कितनी, कब करेगा तू पूरी।
मांग है, मांग है परमपिता, न जाने तुझसे कितनी, कब करेगा तू पूरी।
अब, आज ओर कल कहके न टाल तू, करनी होगी जो अभी की अभी
जो एक से अनंत तक भरी है मेरे प्रियतम के जीवन की बेहतरी।
मझधार में सागर के भेजा है तूने, तो क्यों तुला है छीनने को नैया हमारी।
बड़ी मुश्किलों से पाया है सहारा, तो क्यों तुला है बनाने को हमको बेसहारा।
तेरा प्रिय है तो हमारा भी प्रिय है, क्यों आँक रहा है कम ओर ज्यादा को।
बिगड़ेगा न कुछ तेरा, बिछुड़ जायेंगे जन्मों जन्मो के लिये फिर से हम।
दम न है हममें, फिर भी बेदम ना हूऑ हूँ, कि तूने बस बोल दिया।
आज कितना भी कम हूँ दिखाउँगा जोर दिल का इसी पल ओर अभी।
करनी पड़ेगी तुझे हर मांग मेरी पूरी, दूंगा दिल खोलके प्यार तुझको।
- डॉ.संतोष सिंह
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