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Hymn No. 2550 | Date: 16-Mar-2001
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हें रघुनाथ करो कृपा इक बार फिर से इस दीन हीन पे।
हें रघुनाथ करो कृपा इक बार फिर से इस दीन हीन पे।
प्रारब्ध की है दीवाल बीच में, बढ़ाये ऊंचाई कर्मों के पत्थरों से।
करता है वादा न देगा अब कोई मौका, जो होना पड़े विमुख कभी तुझसे।
भाव अनेकों - अनेक आलोडित हो रहे हैं हृद्य में लेके तुझे।
सही नही जा, रही है जुदाई, करना चाह रहा है पर का इजहार वो अपने।
अब कोई मौका ना चूकना चाह रहा है, तेरे सपनों के साकार करने का।
ताव दिलाया कई बार तुझे, अब भावों में बहाना चाहता है तुझे अपने।
विश्वास कर इक बार तू फिर से, मौका न दूंगा अविश्वास का अब।
रब अब तूं कर दे मेरे ख्वाबों को साकार, दे दूंगा आकार प्यार को दिल से अपने।
है लाखो लाख बार कृपा करने वाले रघुनाथ, कर दो कृपा इक् बार फिर से हमपे।


- डॉ.संतोष सिंह