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Hymn No. 2564 | Date: 01-May-2002
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है मां, है मां, आया हूँ तेरे पास से कर्मों की झोली लेके।
है मां, है मां, आया हूँ तेरे पास से कर्मों की झोली लेके।
करना चाहता था बहुत कुछ, कर न पाया हूँ कुछ भी अभी तक।
हिम्मत अब भी है, चाहतों की राह बिना बदले पहुँचना चाहता हूँ पास तेरे।
जो न तू देगा सहारा, तो कौन संवारेगा इस बिगड़ी हुयी किस्मत को।
जो तुझको न सुनाऊंगा, तो किसके आगे दिल खोलके रखूंगा।
ऐसा क्या है मेरे कर्मों की गठरी में, जिससे तू भी न मुक्त कर पाये।
इस मुरझाये चेहरे पे, कब आयेगी उन्मुक्त हंसी जीवन जीने की।
ऐसे किस पाश से बंधा हूँ, जो तेरे पास रहके न आ पा रहा हूं पाश तेरे।
मां कितना भी बड़ा हो जाऊं, पर माँ तेरे वास्ते रहूँगा पुत्र तेरा।
जब तक है जान जिस्म में मेरे, मां - मां कि रट् लगाता रहूँगा सदा।


- डॉ.संतोष सिंह