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Hymn No. 2563 | Date: 22-Apr-2002
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प्रभू तू बसा है कण–कण में, कैसे करुँ न जब तेरी उपस्थिति हो सारे जहां मे।
प्रभू तू बसा है कण–कण में, कैसे करुँ न जब तेरी उपस्थिति हो सारे जहां मे।
प्रभू तू बसा है क्षण-क्षण में, कैसे करुं न जब काल का पहिया घूमे तेरे इशारे पे।
प्रभु तू बसा है हर दिल में, कैसे करुं न जब याद दिलाये तेरी किसी न किसी बातों से।
प्रभु तू बसा है हर मन में, कैसे करुं न जब सब कुछ होता है प्रारब्ध के अनुरूप।
प्रभु तू बसा है हर ओर चाहे हो दुनिया का कोई छोर, कैसे करुँ न जब तेरी ही सूरत नजर आये।
प्रभु तू बसा है सजीव निर्जीव में, कैसे करूँ न चाहे वो कुछ बदलता रहता है स्वरुप पल पल।
प्रभु तू बसा है अच्छे ओर बुरों में, कैसे करूँ न जब तूने न मिटाया ओर छोड़ दिया कर्में में।
प्रभू तू बसा है हर सूरत में, कैसे करूँ न जब हर सूरत दिवाना हो कोई न कोई संसार में।
प्रभु तू बसा हर मूरत में, कैसे करूँ न जब कोई न कोई मनो कथा जुड़ी हो तुझसे।
प्रभु तू बसा है कहां नहीं, कैसे करूँ न जब सब कुछ समाया हो तेरे ही अंतर में।


- डॉ.संतोष सिंह