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Hymn No. 2568 | Date: 06-May-2002
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प्रभु किस ओर तू नहीं, जिधर उठे नजर उस ओर नजर तू आये।
प्रभु किस ओर तू नहीं, जिधर उठे नजर उस ओर नजर तू आये।
प्रभु कैसे बया करूँ तेरे रूप को, जो निहारूँ तो निहारता चला जाऊँ।
प्रभु कैसे गाऊँ गीत तेरी महानता के, जो शब्दों के दायरे में बंध न पाये तेरी महिमा।
प्रभु कैसे छुपाऊँ तेरे प्रेम को, जब मदहोश होता रहूँ बार - बार यादों में तेरी।
प्रभु कैसे छुपाऊँ दिल के दर्द को, जब बेचैन हो नजर राह तकते तकते तेरी।
प्रभु कैसे बताऊँ मन की हर बात को, जब इंतजार ही इंतजार हो जीवन में।
प्रभु कैसे दूं सौगात प्यार भरी, मिलते ही सताने लगे डर बिछुड़ने का।
प्रभु क्या नाम दूं तेरे मेरे रिश्ते को, जब हर रिश्ते का स्वरूप नजर आये तुझमें।
प्रभु कैसे मांगू कोई चीज तुझसे, जब सब कुछ मिल गया हो तेरे रूप में।
प्रभु रही न अब शब्दों के बस की बात, जो उतार सकूँ अपने प्रेम को उसमे।
- डॉ.संतोष सिंह
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