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Hymn No. 2571 | Date: 18-May-2002
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क्या फर्क पड़ता है, कि हो जाये ये कि न हूआ हो।
क्या फर्क पड़ता है, कि हो जाये ये कि न हूआ हो।
तेरे दम से जो बात बनती हो तो बिगड़ भी गयी क्या से।
हर हाल में मस्ती में जीना सिखा दिया मायने नहीं किसीका।
सुख भी तो बीता है, तो क्यों न बीतेगा, दुःख जिंदगी का।
बीतने वाली जिंदगी में चाहके भी कौन कितना टिक सका है।
पुरूषार्थ का बाना पहन या आलस या रोना रोके कौन रुक सका है।
अगर सोने वाला है तो हॉल दोनो में इसका इक् सा है।
जो जागता रहा है वो करे कोई भी कर्म, हूआ न बाल बांका उसका।
फर्क तो है हमारी नजरो में, दूर रहके चूर रहे करने में।
तेरे साथ रहके जो न पा सके, तो दूर रहके क्या खाक् पायेगे।


- डॉ.संतोष सिंह