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Hymn No. 2573 | Date: 21-May-2002
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बदनाम है, बदनाम है, तेरी महफिल में हम सबसे ज्यादा बदनाम हैं, बदनाम है।
बदनाम है, बदनाम है, तेरी महफिल में हम सबसे ज्यादा बदनाम हैं, बदनाम है।

गुरेज न है हमको बदनामियों से, पर आदतों के हम शिकार हैं, शिकार हैं।

बदले बदलती नहीं है आदतें, रोको तो रूक, अचानक फिर रोक लेती है राहें।

लाख चाहा फिर भी हारता रहा, हार हारके लगाता गया गुहार तेरी रहमत के।

विश्वास हमको न है खुद पे पर है तेरी रहमत पे, जो हारने न देगा अब जिंदगी को।

जिंदगी को जीते जीते, जी जाऊंगा तेरा बनके हसरतों को हकीकत में बदलके।

तेरे संग रहके आंच न आने दूंगा तेरे नाम पे, जो प्यार से तेरा नाम कर जाऊंगा।

देता न हूँ तसल्ली झूठी तुझे, ये तो आवाज है मेरे अंतर में छूपी बातों का।

लाख गिरा हूंगा, गिरके भी उठके तेरा नाम लेके तेरी और बड़ा हूंगा।

बदनाम हूँ तो क्या, जोशो खरोश इसे तेरे नाम करुँगा।


- डॉ.संतोष सिंह