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Hymn No. 2577 | Date: 25-May-2002
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खिला मन, खिला दिल, खिली-खिली बातें करता है।
खिला मन, खिला दिल, खिली-खिली बातें करता है।
तेरे नाना स्वरुपों को देखके, मन ही मन खूश होता है।
यूं ही भावों में गोता लगाते लगाते तेरे करीब पहुँच जाता है।
न जाने ऐसी कैसी कसक होती है कि दिल को छू लेती है।
खुद विरह के आग में जलना चाहता है, पर तुझे न तड़पाना चाहता है।
झुंमता रहा है तेरे संग ख्वाबों में, उसी में दिल संतोष पाता है।
झुंठा हैं प्यार कि सच्चा, पर जब तू याद आता है तो खूब याद आता है।
परवाह न है दिल को अब किसीकी, जन्मों के बाद मिला है जो साथ तेरा।
अनजान न हूं वर्तमान के दौर से, विश्वास है मिल लूंगा तुझसे जरूर से।
रोता नहीं हूँ अब रोना तकदीर का, तकदीर मेरी जो तू बन गया है।


- डॉ.संतोष सिंह