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Hymn No. 2580 | Date: 30-May-2002
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सुनो मेरे गिरधर, सुनो मेरे दिलबर, व्यथा सुनो
सुनो मेरे गिरधर, सुनो मेरे दिलबर, व्यथा सुनो
व्यथा सुनो मेरे दिल की जो आंसुओं में डूबी है, फिर भी मुस्कान है मुख पे तेरी कृपा से।
मारा हूँ न मैं किसी का, मार खाया हूँ जिंदगी में अपने कर्मों से, फिर भी देखता हूँ ख्वाबों में तुझे।
रोज रोज दूर होता गया हूँ तुझसे अपनी फितरतों के चलते, फिर भी पास तुझे बुलाता रहा हूँ।
ऐसी कौन सी कमी ना है मुझमें, एक ढूंढ़ो मिलती है हजारों, फिर भी रहम करता है तू।
रहमों से घिरके भ्ररम में जीता हूं, फिर भी तू प्यार का धरम निभाता है हमेशा से।
किये हुये वादों को तोड़के न जाने कितनी बार दिल दुखाया तेरा, मुस्कुराके तूने छोड़ा मुझे हर बार।
तेरे दरबार का हूँ सबसे ज्यादा बेकार बंदा, फिर भी देता रहा तवज्जों मेरी बंदगी को।
जोड़ ना पाया बदनामियों के सिवाय कुछ ओर नाम पे अपने, फिर भी उर्फ ना किया तूने मुझसे।
झूठी दुनिया में झूठ का आसरा लेके जीता रहा हूँ, फिर भी सत्य की राह तू दिखाता रहा।
थक गये, थक गये दिलबर अपने आप से, फिर भी ताजगी का अहसास कराना ना छोड़ा दिल को तूने।
इतने से ना गूरेज किया, जख्मों से भरता गया सीने को तेरे, वाह वाह फिर प्यार लुटाता रहा तू हमपे।
- डॉ.संतोष सिंह
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